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वैदिक ज्योतिष / 27 नक्षत्र महाविज्ञान
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वैदिक ज्योतिष मॉड्यूल: 27 नक्षत्र महाविज्ञान

अध्याय 4.21: उत्तराषाढा नक्षत्र (Uttarashadha Nakshatra) विस्तृत परिचय, पौराणिक कथाएं, 4 चरण नवमांश, 9 नवग्रह प्रभाव व सात्विक उपाय

उत्तराषाढा नक्षत्र का अति-विस्तृत परिचय, दश विश्वेदेव व धर्म-विजय की पौराणिक महागाथा, सूर्य स्वामित्‍व, 4 चरण नवमांश व 9 नवग्रह फल।

भचक्र का एकविंशति नक्षत्र उत्तराषाढा (Uttarashadha - स्थायी धर्म-विजय, सार्वभौमिक सत्य एवं नेतृत्व नक्षत्र) का विस्तृत खगोलीय व पौराणिक स्वरूप, 10 विश्वेदेवों (क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल आदि) की पावन महागाथा, हाथी दांत व विजय शय्या (Elephant Tusk/Plank) प्रतीक की प्रतापी ऊर्जा, सूर्य देव का स्वामित्‍व, धनु-मकर (26° 40' धनु से 10° 00' मकर) विस्तार, 4 पद नवमांश विभाजन (धनु व मकर वर्गोत्तम पद), 9 नवग्रहों का उत्तराषाढा नक्षत्र में विस्तृत फलित एवं सात्विक उपाय
📜 मेंटर Vikraant का आत्मीय मार्गदर्शन (Guru's Keynote)

प्रिय शिष्य! वैदिक ज्योतिष में 360 अंश के संपूर्ण आकाशमंडल का एकविंशति नक्षत्र 'उत्तराषाढा' (Uttarashadha) है। धनु राशि के 26° 40' से मकर राशि के 10° 00' तक फैला यह नक्षत्र 'उत्तर विजय' (Final Permanent Victory), 10 विश्वेदेवों (दस सार्वभौमिक देवता) की सात्विक धर्म-ऊर्जा, हाथी के प्रतापी दांत प्रतीक का अखंड स्वाभिमान, और आत्मा के कारक 'सूर्य देव' के प्रचंड राजसी तेज का साक्षात प्रतीक है। महर्षि पराशर के अनुसार, उत्तराषाढा नक्षत्र के स्वामी आत्मा, पिता, सत्ता और धर्म-राजयोग के कारक 'सूर्य देव' हैं और इसके अधिष्ठात्री देवता सार्वभौमिक धर्म की रक्षा करने वाले साक्षात 'दश विश्वेदेव' (Vishvedevas) हैं। यह नक्षत्र जातक को जीवन के अंतिम युद्ध में स्थायी विजय, सर्वोच्च राष्ट्रपति/प्रधानमंत्री पद और समाज में पूजनीय धर्मराज बनाता है।

"विश्वेदेवा अधिपा यस्य रविः (सूर्यः) स्वामी महाबलः।
धन्व कीट-संस्थितो धीरो अति-धर्मराज कर्मकारकः॥
दन्तरूपो मनुष्यगणो अन्त्यनाड़ी धर्मसाधकः।
स्थायीविजयप्रदो धनी सर्वसिद्धि प्रदायकः॥"


(भावार्थ: दश विश्वेदेव जिनके अधिष्ठात्री देवता हैं, महाबली सूर्य देव जिनके स्वामी हैं, जो धनु व मकर राशि की संधि पर स्थित, धीर स्वभाव वाले और अति-धर्मराज कर्म करने वाले हैं, वे उत्तराषाढा नक्षत्र हैं। हाथी दांत प्रतीक, मनुष्य गण, अंत्य नाड़ी से युक्त यह नक्षत्र स्थायी विजय व असीम धन प्रदान कर सर्वसिद्धि देता है।)

💡 1. परिचय (Introduction & Utility of Uttarashadha Nakshatra)

  • भचक्र का एकविंशति द्वार एवं सूर्य का महा-स्वामित्‍व: उत्तराषाढा (Uttarashadha) संपूर्ण भचक्र का एकविंशति नक्षत्र (26° 40' धनु से 10° 00' मकर राशि) है, जिसके स्वामी आत्मा, तेज, नेतृत्व, धर्म और प्रशासनिक सत्ता के कारक साक्षात 'सूर्य देव' हैं। यह नक्षत्र स्थायी सफलता का मूलाधार है।
  • दश विश्वेदेव अधिष्ठाता एवं स्थिर/ध्रुव स्वभाव: इस नक्षत्र के देवता दस सार्वभौमिक देवगण 'विश्वेदेव' (Vishvedevas: क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धृति, कुरु, पुरूरवा, माद्रवा) हैं। इसका स्वभाव 'स्थिर व ध्रुव' (Fixed & Permanent) है; इसमें सत्य और न्याय के पथ पर चलकर स्थायी साम्राज्य स्थापित करने की शक्ति होती है।
  • हाथी का दांत व विजय पटरा (Tusk/Plank) प्रतीक का रहस्य: उत्तराषाढा का मुख्य प्रतीक 'हाथी का दांत' (Elephant Tusk) अथवा 'विजय शय्या का पटरा' है। हाथी का दांत प्रतापी स्वाभिमान और अटूट चरित्र का प्रतीक है जिसे कोई तोड़ नहीं सकता, जबकि विजय पटरा कठिन युद्ध के बाद मिलने वाले स्थायी विश्राम व सिंहासन का द्योतक है।
  • 4 चरण नवमांश विभाजन (4 Padas Analysis): उत्तराषाढा के 4 चरण क्रमशः धनु (गुरु - धनु वर्गोत्तम!), मकर (शनि - मकर वर्गोत्तम व पुष्कर!), कुंभ (शनि) और मीन (गुरु) नवमांश में विभाजित हैं, जो जातक को दार्शनिक सम्राट, कठोर प्रशासक, वैज्ञानिक समाज-सुधारक व निष्पक्ष धर्मराज पद देते हैं।
  • शारीरिक अंग व कालपुरुष घुटने-हड्डियां: कालपुरुष के शरीर में उत्तराषाढा नक्षत्र जांघें, कमर, घुटने (Knees), हड्डियां (Bones), त्वचा और जोड़ों का स्वामी है।
  • मनुष्य गण, अंत्य नाड़ी व नकुल (नेवला) योनि का प्रभाव: उत्तराषाढा नक्षत्र मनुष्य गण, अंत्य नाड़ी और नकुल योनि (अभिजीत नक्षत्र सम्बद्ध!) से सम्बद्ध है; यह राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, मुख्य न्यायाधीशों, सर्वोच्च सेनापतियों, आईएएस अधिकारियों, बड़े उद्योगपतियों और निष्काम संतों का नेतृत्व करता है।
  • सात्विक परिहार एवं ऊर्जा संतुलन: उत्तराषाढा नक्षत्र के जातकों को अत्यधिक कार्य-संजोग (Workaholism), अकेलापन, और अत्यधिक कठोर अनुशासन से बचने हेतु भगवान सूर्य नारायण व शिव जी की उपासना, 'आदित्य हृदय स्तोत्र' पाठ, तथा माणिक्य (Ruby) धारण करना अत्यंत फलदायी होता है।

📖 2. उत्तराषाढा नक्षत्र का पौराणिक, खगोलीय एवं आध्यात्मिक स्वरूप (Puranic & Astronomical Attributes)

2.1 दश विश्वेदेव (10 Universal Deities) की पौराणिक महागाथा एवं स्थायी विजय

ऋग्वेद, तैत्तिरीय संहिता और वायु पुराण के अनुसार, 'विश्वेदेव' दस सार्वभौमिक देवताओं का समूह हैं—क्रतु (दृढ़ संकल्प), दक्ष (कार्य कुशलता), वसु (समृद्धि), सत्य (अखंड सत्य), काल (समय ज्ञान), काम (पवित्र अभिलाषा), धृति (धैर्य), कुरु (धर्म कर्म), पुरूरवा (दीप्ति) और माद्रवा (आनंद)।

पूर्वाषाढा नक्षत्र प्रथम विजय दिलाता है, जबकि 'उत्तराषाढा' नक्षत्र अंतिम, पूर्ण और स्थायी विजय (Permanent Universal Victory) प्रदान करता है। दश विश्वेदेवों के आशीर्वाद से उत्तराषाढा नक्षत्र का जातक जिस भी कार्य में हाथ डालता है, उसमें उसे कोई पराजित नहीं कर सकता और उसकी विजय युगों-युगों तक अमर रहती है।

2.2 'हाथी का दांत' (Elephant Tusk) प्रतीक का पावन आध्यात्मिक रहस्य एवं स्वाभिमान

उत्तराषाढा नक्षत्र का मुख्य प्रतीक 'हाथी का दांत' (Elephant Tusk) है। गजराज का दांत केवल उसकी सुंदरता नहीं, बल्कि उसकी अभेद्य सुरक्षा और शक्ति का प्रतीक है। हाथी जीवित रहे या न रहे, उसके दांत का मूल्य कभी कम नहीं होता।

यह प्रतीक उत्तराषाढा नक्षत्र के जातक के 'अखंड चरित्र और स्वाभिमान' को दर्शाता है। ऐसा जातक अपने सिद्धांतों और वचनों से कभी समझौता नहीं करता। इसका द्वितीय प्रतीक 'विजय पटरा' लंबे धर्म-युद्ध के बाद मिलने वाले राज्य सिंहासन का प्रतिनिधित्व करता है।

2.3 भगवान श्री राम के 'रामराज्य' (Ramrajya) स्थापना की पौराणिक महागाथा

पौराणिक इतिहास के अनुसार, उत्तराषाढा नक्षत्र का सीधा संबंध मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के अयोध्या लौटने और 'रामराज्य' की स्थापना से है। पूर्वाषाढा में लंकापति रावण का वध (अधर्म पर विजय) हुआ और उत्तराषाढा में श्री राम का राज्याभिषेक होकर स्थायी धर्म-राज्य स्थापित हुआ। उत्तराषाढा नक्षत्र जातक के जीवन में शुरुआती संघषों के पश्चात् स्थायी रामराज्य (अखंड शांति व समृद्धि) लाता है।

2.4 सूर्य (स्वामी), दश विश्वेदेव (अधिष्ठाता), धनु-मकर (गुरु-शनि) का महा-सम्राट राजयोग

नक्षत्र स्वामी सूर्य (आत्मा व सत्ता), अधिष्ठाता दश विश्वेदेव (सार्वभौमिक धर्म) और धनु-मकर राशि (ज्ञान व कर्म) का यह दुर्लभ संगम जातक को देश का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, और सर्वोच्च मुख्य न्यायाधीश बनाता है।

2.5 प्रथम चरण (26° 40' - 30° 00' धनु): धनु नवमांश, गुरु का ज्ञान व 'धनु वर्गोत्तम' पद

उत्तराषाढा नक्षत्र का प्रथम चरण धनु राशि (26° 40' से 30° 00') धनु नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। यह अत्यंत पावन 'धनु वर्गोत्तम' (Vargottama) पद है! यह चरण जातक को अगाध धार्मिक ज्ञान, कानून का ज्ञाता, वेदपाठी, और महान दार्शनिक सम्राट बनाता है।

2.6 द्वितीय चरण (00° 00' - 03° 20' मकर): मकर नवमांश, शनि का अनुशासन, 'मकर वर्गोत्तम' व पुष्कर पद

उत्तराषाढा नक्षत्र का द्वितीय चरण मकर राशि (00° 00' से 03° 20') मकर नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी कर्मफलदाता शनि देव हैं। यह पावन 'मकर वर्गोत्तम' एवं 'पुष्कर नवमांश' (Pushkara Navamsha) है! यह चरण जातक को देश का प्रधानमंत्री, कठोर अनुशासित प्रशासक, और अखंड धन-संपदा का स्वामी बनाता है।

2.7 तृतीय चरण (03° 20' - 06° 40' मकर): कुंभ नवमांश, शनि की शोध बुद्धि व समाज-सुधारक

उत्तराषाढा नक्षत्र का तृतीय चरण मकर राशि (03° 20' से 06° 40') कुंभ नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी शनि देव हैं। कुंभ एक स्थिर वायु तत्व राशि है। यह चरण जातक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक क्रांतियों का नेता, विशाल संस्थानों का संस्थापक और निष्पक्ष समाज-सुधारक बनाता है।

2.8 चतुर्थ चरण (06° 40' - 10° 00' मकर): मीन नवमांश, गुरु की अंतर्दृष्टि व सात्विक धर्मराज

उत्तराषाढा नक्षत्र का चतुर्थ चरण मकर राशि (06° 40' से 10° 00') मीन नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। मीन द्विस्वभाव जल तत्व राशि है। यह चरण जातक को सर्वोच्च मुख्य न्यायाधीश, सात्विक दानवीर, और समाज का मार्गदर्शक निष्काम धर्मराज बनाता है।

📊 3. उत्तराषाढा नक्षत्र के मूल खगोलीय एवं पौराणिक मापदंडों की महा-मास्टर तालिका

गुण व मापदंड (Attribute) ज्योतिषीय मान व पौराणिक विवरण (Astrological & Puranic Details)
भचक्र क्रम व विस्तार (Zodiac Range)एकविंशति नक्षत्र (26° 40' धनु से 10° 00' मकर राशि तक)
स्वामी ग्रह (Ruling Planet)सूर्य देव (Sun / रवि / आत्मा व सत्ता कारक)
अधिष्ठात्री देवता (Deity)दश विश्वेदेव (Vishvedevas / 10 सार्वभौमिक देवगण)
प्रतीक चिह्न (Symbol)हाथी का दांत / विजय शय्या का पटरा (Elephant Tusk / Plank)
गण व नाड़ी (Gana & Nadi)मनुष्य गण (Manushya Gana) / अंत्य नाड़ी (Antya Nadi)
योनि व तत्व (Yoni & Tattva)नकुल योनि (Mongoose / नेवला) / अग्नि-पृथ्वी तत्व
नक्षत्र स्वभाव (Quality)स्थिर व ध्रुव (Fixed & Permanent)
सम्बद्ध राशि (Primary Sign)धनु (1 पद - गुरु) व मकर राशि (3 पद - शनि)
दिशा व स्थिति (Direction)उत्तर दिशा (North) / ऊर्ध्वमुख नक्षत्र
शरीर के अंग (Body Signification)घुटने, जांघें, कमर, हड्डियां व त्वचा

🔥 4. उत्तराषाढा नक्षत्र के विविध नाम एवं symbolic गुणधर्म तालिका

सं. व नाम मूल संस्कृत अर्थ आध्यात्मिक व खगोलीय गुणधर्म ज्योतिषीय प्रभाव व फलित
1. उत्तराषाढा (Uttarashadha)अंतिम स्थायी अपराजित विजयजीवन के अंत तक अखंड सफलताप्रधानमंत्री, राष्ट्रपति व सम्राट
2. वैश्वेदेवी (Vaishvedevi)दश विश्वेदेवों का अपना पावन क्षेत्रसार्वभौमिक सत्य व धर्म रक्षानिष्पक्ष चीफ जस्टिस व धर्मराज
3. गात्री (Gatri)हाथी दांत जैसी मजबूत कायाअभेद्य चरित्र व उच्च स्वाभिमानअटूट सिद्धांतों वाला नेता
4. वर्गोत्तमा (Vargottama)धनु व मकर में वर्गोत्तम पदद्विगुणित शुभ फल व साम्राज्यअखंड धन, पद व राजयोग
5. सौरा (Saura)सूर्य देव का अपना नक्षत्रप्रचंड राजसी तेज व आत्मासर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी
6. ध्रुवा (Dhruva)स्थिर व अमर रहने वाली शक्तिकार्यों में अमरता व स्थायी ख्यातिविशाल साम्राज्य के संस्थापक

✨ 5. उत्तराषाढा नक्षत्र में 4 चरण नवमांश विभाजन तालिका (4 Padas Table)

नक्षत्र चरण (Pada) विस्तार अंश (Degree Range) नवमांश राशि (Navamsha) नवमांश स्वामी फलित गुणधर्म व स्वभाव
प्रथम चरण (Pada 1)26° 40' धनु - 30° 00' धनुधनु नवमांश (Sagittarius)गुरु (Jupiter)धनु वर्गोत्तम! प्रतापी धर्मराज।
द्वितीय चरण (Pada 2)00° 00' मकर - 03° 20' मकरमकर नवमांश (Capricorn)शनि (Saturn)मकर वर्गोत्तम! पुष्कर! PM, सम्राट।
तृतीय चरण (Pada 3)03° 20' मकर - 06° 40' मकरकुंभ नवमांश (Aquarius)शनि (Saturn)वैज्ञानिक समाज-सुधारक, संस्थापक।
चतुर्थ चरण (Pada 4)06° 40' मकर - 10° 00' मकरमीन नवमांश (Pisces)गुरु (Jupiter)सात्विक मुख्य न्यायाधीश, दानवीर।

♉ 6. उत्तराषाढा नक्षत्र में 9 नवग्रहों का विस्तृत फलित तालिका चार्ट (9 Planets in Uttarashadha Table)

ग्रह स्थिति (Planet in Uttarashadha) ज्योतिषीय स्थिति व सम्बद्धता फलित प्रभाव व व्यक्तित्व (Personality Traits) करियर व राजयोग (Career & Success) सावधानियां व सात्विक परिहार
1. सूर्य (Sun) in उत्तराषाढा स्वराशि (Own Nakshatra) / वर्गोत्तम महा-सम्राट राजयोग! तेजस्वी। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, IAS प्रमुख। अहम् से बचें; सूर्य अर्घ्य।
2. चंद्रमा (Moon) in उत्तराषाढा जन्म नक्षत्र / स्थिर मन धीर-गंभीर मन, निष्पक्ष न्याय। चीफ जस्टिस, उच्च प्रशासक, लेखक। अत्यधिक गांभीर्य से बचें; शिव पूजन।
3. मंगल (Mars) in उत्तराषाढा मकर भाग में परम उच्च (Exalted)! महा-पराक्रम राजयोग! निडर। सर्वोच्च सेनापति, सर्जन, बिल्डर। क्रोध पर नियंत्रण रखें; हनुमान पूजा।
4. बुध (Mercury) in उत्तराषाढा मित्र राशि / प्रतापी कूटनीति तीक्ष्ण तर्क बुद्धि, नीति कुशल। विदेश नीति सम्राट, कूटनीतिज्ञ, CA। कार्य-तनाव से बचें; दुर्गा पूजा।
5. गुरु (Jupiter) in उत्तराषाढा मित्र राशि / वर्गोत्तम धर्मराज अगाध ज्ञान, सार्वभौमिक धर्म। कुलपति, सर्वोच्च न्यायाधीश, संत। ज्ञान के अहम् से बचें; पुखराज।
6. शुक्र (Venus) in उत्तराषाढा मित्र राशि / राजसी ऐश्वर्य प्रतापी सौंदर्य, लक्जरी जीवन। लक्जरी सम्राट, कला निर्देशक। अति-विलासिता से बचें; श्रीसूक्त पाठ।
7. शनि (Saturn) in उत्तराषाढा मकर भाग में स्वगृही! महा-कर्मठ राजयोग! धीर। माइनिंग प्रमुख, न्यायाधीश, उद्योगपति। अकेलापन से बचें; तेल दान।
8. राहु (Rahu) in उत्तराषाढा मित्र राशि / अंतर्राष्ट्रीय सत्ता विशाल राजनीतिक महत्वाकांक्षा। अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिज्ञ, AI वैज्ञानिक। अनैतिक मार्ग से बचें; सप्तधान्य दान।
9. केतु (Ketu) in उत्तराषाढा मित्र राशि / धर्म मोक्ष अगाध आत्मिक तपोबल, वैराग्य। योग आचार्य, प्राणायाम साधक, संत। अति-उदासीनता से बचें; गणेश पूजन।
9 10 11 12 1 2 3 4 5 6 7 8 सूर्य गुरु 5°
📊 चित्र 1: उत्तराषाढा नक्षत्र भचक्र स्थिति एवं स्थायी धर्म-विजय कुण्डली (प्रथम चरण धनु 26° 40'-30° 00' | द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ चरण मकर 00° 00'-10° 00' | सूर्य स्वामित्‍व | 10 विश्वेदेव)

👑 उत्तराषाढा नक्षत्र: दश विश्वेदेव, हाथी दांत एवं रामराज्य धर्म-विजय

  • दश विश्वेदेव व सार्वभौमिक धर्म: इसके अधिष्ठात्री 10 विश्वेदेव (क्रतु, दक्ष, वसु, सत्य, काल, काम, धृति, कुरु, पुरूरवा, माद्रव) हैं। यह जातक को अडिग सत्यनिष्ठा, नैतिक प्राधिकार और स्थायी सार्वभौमिक प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं।
  • धनु व मकर दोहरे वर्गोत्तम पद: उत्तराषाढा का प्रथम चरण धनु नवमांश में वर्गोत्तम (धर्म व आदर्श) और द्वितीय चरण मकर नवमांश में वर्गोत्तम (व्यावहारिक कर्म व शासन) होता है। यह जातक को स्थायी प्रशासनिक विजय और जनप्रियता देता है।
  • हाथी का दांत (Tusk) प्रतीक: इसका प्रतीक गजदंत है, जो कभी मुड़ता नहीं। यह अखंड स्वाभिमान, नेतृत्व, रामराज्य की नीति और अपराजित विजय का प्रतीक है।

📝 7. मुख्य बिंदु सार-संक्षेप (Chapter Summary)

  • 1. भचक्र का एकविंशति नक्षत्र: उत्तराषाढा नक्षत्र 26° 40' धनु से 10° 00' मकर तक फैला भचक्र का एकविंशति नक्षत्र व स्थायी विजय का धाम है।
  • 2. दश विश्वेदेव व रामराज्य कथा: इसके देवता 10 विश्वेदेव (सार्वभौमिक धर्मपति) हैं तथा श्री राम के अयोध्या लौटकर रामराज्य स्थापना की कथा इससे सम्बद्ध है।
  • 3. हाथी दांत व विजय पटरा प्रतीक: हाथी का दांत प्रतीक अखंड स्वाभिमान व चरित्र का द्योतक है, जिसे कोई शत्रु तोड़ नहीं सकता।
  • 4. 4 चरण नवमांश विभाजन: इसके प्रथम 2 चरण (धनु व मकर) वर्गोत्तम व पुष्कर पद हैं, जो जातक को प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति पद का राजयोग देते हैं।
  • 5. सात्विक परिहार: अहम् से बचने हेतु प्रातः सूर्य अर्घ्य देना, 'आदित्य हृदय स्तोत्र' पाठ, तथा अनामिका में तांबे/सोने में माणिक्य धारण करना शुभ रहता है।

❓ 8. बहुप्रचलित प्रश्नोत्तरी (SEO FAQs)

प्रश्न 1: 10 विश्वेदेवों की पौराणिक कथा और 'स्थायी विजय' का उत्तराषाढा नक्षत्र से क्या संबंध है?
उत्तर: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार 'विश्वेदेव' दस सार्वभौमिक देवगणों (सत्य, धृति, काल, वसु आदि) का समूह हैं जो ब्रह्मांडीय धर्म की रक्षा करते हैं। पूर्वाषाढा नक्षत्र प्राथमिक विजय देता है, जबकि उत्तराषाढा नक्षत्र 10 विश्वेदेवों के आशीर्वाद से जीवन में कभी न समाप्त होने वाली 'अंतिम व स्थायी विजय' (Permanent Victory) प्रदान करता है।
प्रश्न 2: उत्तराषाढा नक्षत्र में धनु व मकर वर्गोत्तम (Vargottama Padas) का जातक के करियर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: उत्तराषाढा का प्रथम चरण धनु राशि में धनु नवमांश (वर्गोत्तम) और द्वितीय चरण मकर राशि में मकर नवमांश (वर्गोत्तम व पुष्कर) पड़ता है। वर्गोत्तम पद में जन्मे जातक अति-उच्च प्रशासनिक पद (जैसे देश का प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सेनापति, मुख्य न्यायाधीश या विशाल उद्योगपति) प्राप्त करते हैं और समाज में इतिहास रचते हैं।
प्रश्न 3: उत्तराषाढा नक्षत्र के जातकों के लिए सबसे अचूक सात्विक उपाय क्या हैं?
उत्तर: उत्तराषाढा नक्षत्र के स्वामी साक्षात सूर्य देव और देवता दश विश्वेदेव हैं। इनके दोष शमन व अखंड प्रतिष्ठा हेतु प्रतिदिन प्रातःकाल तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन व अक्षत मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य देना, 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ करना, अपने पिता व गुरुजनों का सम्मान करना, और अनामिका उंगली में सोने या तांबे में 5 से 7 रत्ती का शुद्ध बर्मीज माणिक्य (Ruby) धारण करना परम लाभदायक है।
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