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वैदिक ज्योतिष / 27 नक्षत्र महाविज्ञान
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वैदिक ज्योतिष मॉड्यूल: 27 नक्षत्र महाविज्ञान

अध्याय 4.18: ज्येष्ठा नक्षत्र (Jyeshtha Nakshatra) विस्तृत परिचय, पौराणिक कथाएं, 4 चरण नवमांश, 9 नवग्रह प्रभाव व सात्विक उपाय

ज्येष्ठा नक्षत्र का अति-विस्तृत परिचय, देवराज इंद्र व ज्येष्ठा-मूल गंडांत की पौराणिक महागाथा, बुध स्वामित्‍व, 4 चरण नवमांश व 9 नवग्रह फल।

भचक्र का अष्टादश नक्षत्र ज्येष्ठा (Jyeshtha - श्रेष्ठता, सुरक्षा कवच एवं गंडांत नक्षत्र) का विस्तृत खगोलीय व पौराणिक स्वरूप, देवताओं के सम्राट देवराज इंद्र की पावन महागाथा, ज्येष्ठा-मूल जल-अग्नि 'गंडांत' (Gandanta) का गहरा आध्यात्मिक रहस्य, शाही छत्र (Royal Umbrella / Amulet) प्रतीक की प्रतापी ऊर्जा, बुध देव का स्वामित्‍व, वृश्चिक राशि (16° 40' से 30° 00') विस्तार, 4 पद नवमांश विभाजन, 9 नवग्रहों का ज्येष्ठा नक्षत्र में विस्तृत फलित एवं सात्विक उपाय
📜 मेंटर Vikraant का आत्मीय मार्गदर्शन (Guru's Keynote)

प्रिय शिष्य! वैदिक ज्योतिष में 360 अंश के संपूर्ण आकाशमंडल का अष्टादश नक्षत्र 'ज्येष्ठा' (Jyeshtha) है। वृश्चिक राशि में 16° 40' से 30° 00' तक फैला यह नक्षत्र भचक्र के द्वितीय चक्र (मघा से ज्येष्ठा तक) का अंतिम पड़ाव, समाज व कुल में सर्वोच्च 'ज्येष्ठता' (Seniority / Excellence), देवराज इंद्र का शाही सिंहासन, सुरक्षा कवच, और ज्येष्ठा-मूल की महा-पावन 'गंडांत संधि' का साक्षात प्रतीक है। महर्षि पराशर के अनुसार, ज्येष्ठा नक्षत्र के स्वामी बुद्धि, तर्क और वाक्-शक्ति के कारक 'बुध देव' हैं और इसके अधिष्ठात्री देवता देवताओं के अधिपति साक्षात 'देवराज इंद्र' (Indra) हैं। यह नक्षत्र जातक को निडर योद्धा, सर्वोच्च कूटनीतिज्ञ और समाज में पूजनीय वरिष्ठ सम्राट बनाता है।

"इंद्रो अधिपा यस्य सौम्यः (बुधः) स्वामी महाबलः।
कीटान्ते संस्थितो तीक्ष्णो अति-प्रतापी कर्मकारकः॥
छत्ररूपो राक्षसगणो आदिनाड़ी धर्मसाधकः।
ज्येष्ठत्वप्रदो धनी सर्वसिद्धि प्रदायकः॥"


(भावार्थ: देवराज इंद्र जिनके अधिष्ठात्री देवता हैं, महाबली बुध देव जिनके स्वामी हैं, जो वृश्चिक राशि के अंत में स्थित, तीक्ष्ण स्वभाव वाले और अति-प्रतापी कर्म करने वाले हैं, वे ज्येष्ठा नक्षत्र हैं। शाही छत्र प्रतीक, राक्षस गण, आदि नाड़ी से युक्त यह नक्षत्र वरिष्ठता व असीम धन प्रदान कर सर्वसिद्धि देता है।)

💡 1. परिचय (Introduction & Utility of Jyeshtha Nakshatra)

  • भचक्र का अष्टादश द्वार एवं बुध का महा-स्वामित्‍व: ज्येष्ठा (Jyeshtha) संपूर्ण भचक्र का अष्टादश नक्षत्र (16° 40' से 30° 00' वृश्चिक राशि) है, जिसके स्वामी बुद्धि, कूटनीति, तर्क और व्यापार के कारक 'बुध देव' हैं। यह नक्षत्र बौद्धिक श्रेष्ठता और राजनीतिक चतुरता का मूलाधार है।
  • देवराज इंद्र अधिष्ठाता एवं तीक्ष्ण/दारुण स्वभाव: इस नक्षत्र के देवता देवताओं के सम्राट 'देवराज इंद्र' (Indra) हैं। इसका स्वभाव 'तीक्ष्ण व प्रतापी' (Sharp & Dominant) है; इसमें अपनी सत्ता की रक्षा करने, विरोधियों के षड्यंत्र विफल करने और समाज में सर्वोच्च वरिष्ठ पद संभालने की शक्ति होती है।
  • शाही छत्र व अभिमंत्रित कवच (Umbrella/Amulet) प्रतीक का रहस्य: ज्येष्ठा का प्रतीक चिह्न 'शाही छत्र' (Royal Umbrella) अथवा 'अभिमंत्रित सुरक्षा कुंडल/कवच' (Amulet) है। शाही छत्र प्रजा की रक्षा व सर्वोच्च अधिकार, और सुरक्षा कवच तांत्रिक सिद्धियों का द्योतक है।
  • 4 चरण नवमांश विभाजन (4 Padas Analysis): ज्येष्ठा के 4 चरण क्रमशः धनु (गुरु), मकर (शनि), कुंभ (शनि) और मीन (गुरु - ज्येष्ठा-मूल गंडांत पद!) नवमांश में विभाजित हैं, जो जातक को उच्च दार्शनिक विचार, कठोर व्यावहारिक कूटनीति, वैज्ञानिक शोध व अलौकिक तपोबल देते हैं।
  • शारीरिक अंग व कालपुरुष गर्भाशय-आंत: कालपुरुष के शरीर में ज्येष्ठा नक्षत्र गर्दन, धड़ का दाहिना भाग, गर्भाशय, बड़ी आंत (Colon) और गुदा मार्ग का स्वामी है।
  • राक्षस गण, आदि नाड़ी व महिष (भैंसा) योनि का प्रभाव: ज्येष्ठा नक्षत्र राक्षस गण, आदि नाड़ी और महिष योनि से सम्बद्ध है; यह देश के प्रधानमंत्रियों, रक्षा मंत्रियों, मुख्य न्यायाधीशों, खुफिया एजेंसी (RAW/CIA) प्रमुखों, तांत्रिक साधकों और बड़े उद्योगपतियों का नेतृत्व करता है।
  • सात्विक परिहार एवं ऊर्जा संतुलन: ज्येष्ठा नक्षत्र के जातकों को अत्यधिक अहंकार, अपनी वरिष्ठता का घमंड, और दूसरों को नीचा दिखाने से बचने हेतु देवराज इंद्र व शिव जी की आराधना, 'विष्णु सहस्रनाम' पाठ, तथा गंडांत शांति पूजा व पन्ना (Emerald) धारण करना अत्यंत फलदायी होता है।

📖 2. ज्येष्ठा नक्षत्र का पौराणिक, खगोलीय एवं आध्यात्मिक स्वरूप (Puranic & Astronomical Attributes)

2.1 देवराज इंद्र की पौराणिक महागाथा एवं 'ज्येष्ठता' का रहस्य

महाभारत, ऋग्वेद और वायु पुराण के अनुसार, प्रजापति दक्ष की 27 नक्षत्र कन्याओं में 'ज्येष्ठा' सबसे बड़ी और ज्येष्ठ पुत्री थी। ज्येष्ठा का शाब्दिक अर्थ 'ज्येष्ठ, वरिष्ठ, सर्व-श्रेष्ठ व पूजनीय' (Senior-most / Oldest / Excellent) है।

ज्येष्ठा नक्षत्र पर साक्षात 'देवराज इंद्र' का आधिपत्य है। देवराज इंद्र स्वर्ग के सम्राट, वज्रधारी और देवताओं के स्वामी हैं। इसी कारण ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्मे जातक में जन्मजात नेतृत्व क्षमता (Leadership) होती है। वह अपने परिवार, कार्यस्थल या समाज में कभी द्वितीय स्थान स्वीकार नहीं करता; वह हमेशा सर्वोच्च पद ('ज्येष्ठ') ही प्राप्त करता है।

2.2 'शाही छत्र' (Royal Umbrella) एवं अभिमंत्रित कुंडल प्रतीक का पावन रहस्य

ज्येष्ठा नक्षत्र का मुख्य प्रतीक 'शाही छत्र' (Royal Umbrella) है। प्राचीन काल में राजाओं के मस्तक के ऊपर सुशोभित शाही छत्र इस बात का प्रतीक था कि राजा अपनी प्रजा की समस्त संकटों से रक्षा करने हेतु कटिबद्ध है।

इसका द्वितीय प्रतीक 'अभिमंत्रित कवच/कुंडल' (Earrings / Amulet) है। यह प्रतीक जातक को अदृश्य शत्रुओं और तांत्रिक बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करने वाले अखंड सुरक्षा कवच का प्रतिनिधित्व करता है।

2.3 वृश्चिक-धनु 'ज्येष्ठा-मूल गंडांत' (Gandanta) का महा-पावन आध्यात्मिक रहस्य

ज्येष्ठा नक्षत्र का चतुर्थ चरण (26° 40' से 30° 00' वृश्चिक) भचक्र की सबसे संवेदनशील संधियों में से एक है। यह 'जल राशि' (वृश्चिक) से 'अग्नि राशि' (धनु) के मिलन का 'ज्येष्ठा-मूल गंडांत' (Gandanta) है! यह भचक्र के प्रथम 18 नक्षत्रों (शारीरिक/भौतिक चक्र) की समाप्ति और अंतिम 9 नक्षत्रों (आत्मिक/मोक्ष चक्र) की शुरुआत का महा-द्वार है।

गंडांत चरण में जन्मे जातक को अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में भारी मानसिक संघर्षों से गुजरना पड़ता है। किंतु गंडांत शांति के पश्चात् जातक का अहंकार पूरी तरह भस्म हो जाता है और वह साक्षात सिद्ध योगी बनकर दुनिया पर राज करता है।

2.4 बुध (स्वामी), इंद्र देव (अधिष्ठाता) एवं मंगल (वृश्चिक राशि) का महा-सम्राट राजयोग

नक्षत्र स्वामी बुध (तीक्ष्ण बुद्धि), अधिष्ठाता इंद्र (सत्ता व सिंहासन) और राशि स्वामी मंगल (असीम पराक्रम) का यह त्रिकोण जातक को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कूटनीतिज्ञ, मुख्य न्यायाधीश, और देश का सर्वोच्च शासक बनाता है।

2.5 प्रथम चरण (16° 40' - 20° 00' वृश्चिक): धनु नवमांश, गुरु का ज्ञान व प्रतापी धर्मराज

ज्येष्ठा नक्षत्र का प्रथम चरण वृश्चिक राशि (16° 40' से 20° 00') धनु नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। धनु एक द्विस्वभाव अग्नि तत्व राशि है। यह चरण जातक को अगाध धार्मिक ज्ञान, कानून का ज्ञाता, ओजस्वी वक्ता और चीफ जस्टिस बनने का राजयोग देता है।

2.6 द्वितीय चरण (20° 00' - 23° 20' वृश्चिक): मकर नवमांश, शनि का अनुशासन व व्यावहारिक कूटनीति

ज्येष्ठा नक्षत्र का द्वितीय चरण वृश्चिक राशि (20° 00' से 23° 20') मकर नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी कर्मफलदाता शनि देव हैं। मकर एक चर पृथ्वी तत्व राशि है। यह चरण जातक को कठोर व्यावहारिक बुद्धि, खुफिया एजेंसी (RAW/CIA) में नेतृत्व, और चतुर राजनीतिज्ञ बनाता है।

2.7 तृतीय चरण (23° 20' - 26° 40' वृश्चिक): कुंभ नवमांश, शनि की शोध बुद्धि व वैज्ञानिक दृष्टिकोण

ज्येष्ठा नक्षत्र का तृतीय चरण वृश्चिक राशि (23° 20' से 26° 40') कुंभ नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी शनि देव हैं। कुंभ एक स्थिर वायु तत्व राशि है। यह चरण जातक को अति-सूक्ष्म गुप्त शोध, परमाणु विज्ञान, डेटा विश्लेषण और विशाल संस्था का अध्यक्ष बनाता है।

2.8 चतुर्थ चरण (26° 40' - 30° 00' वृश्चिक): मीन नवमांश, ज्येष्ठा-मूल 'गंडांत' व अलौकिक तपोबल

ज्येष्ठा नक्षत्र का चतुर्थ चरण वृश्चिक राशि (26° 40' से 30° 00') मीन नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। यह महा-पावन 'ज्येष्ठा-मूल गंडांत' (Gandanta) पद है! यह चरण भौतिक आसक्तियों को मिटाकर जातक को असीम आत्म-ज्ञान, तांत्रिक सिद्धि, और परम मोक्ष प्रदान करता है।

📊 3. ज्येष्ठा नक्षत्र के मूल खगोलीय एवं पौराणिक मापदंडों की महा-मास्टर तालिका

गुण व मापदंड (Attribute) ज्योतिषीय मान व पौराणिक विवरण (Astrological & Puranic Details)
भचक्र क्रम व विस्तार (Zodiac Range)अष्टादश नक्षत्र (16° 40' से 30° 00' वृश्चिक राशि तक)
स्वामी ग्रह (Ruling Planet)बुध देव (Mercury / सौम्य / बुद्धि व वाक् कारक)
अधिष्ठात्री देवता (Deity)देवराज इंद्र (Indra / स्वर्गपति / वज्रधारी व सम्राट)
प्रतीक चिह्न (Symbol)शाही छत्र / अभिमंत्रित सुरक्षा कवच (Royal Umbrella / Amulet)
गण व नाड़ी (Gana & Nadi)राक्षस गण (Rakshasa Gana) / आदि नाड़ी (Adi Nadi)
योनि व तत्व (Yoni & Tattva)महिष योनि (Buffalo / भैंसा) / जल तत्व (गंडांत नक्षत्र)
नक्षत्र स्वभाव (Quality)तीक्ष्ण व प्रतापी (Sharp & Dominant / गंडांत)
सम्बद्ध राशि (Primary Sign)वृश्चिक राशि (Scorpio / राशि स्वामी मंगल)
दिशा व स्थिति (Direction)पश्चिम दिशा (West) / तिर्यकमध्य नक्षत्र
शरीर के अंग (Body Signification)गर्दन, धड़ की दाहिनी ओर, बड़ी आंत व गर्भाशय

🔥 4. ज्येष्ठा नक्षत्र के विविध नाम एवं symbolic गुणधर्म तालिका

सं. व नाम मूल संस्कृत अर्थ आध्यात्मिक व खगोलीय गुणधर्म ज्योतिषीय प्रभाव व फलित
1. ज्येष्ठा (Jyeshtha)सबसे बड़ी, वरिष्ठ, सर्वश्रेष्ठसमाज व कुल में सर्वोच्च पदमुख्य प्रशासक, PM व सम्राट
2. ऐंद्री (Aindri)देवराज इंद्र का अपना पावन क्षेत्रसत्ता, सिंहासन व वज्रपात शक्तिदेश का सर्वोच्च नेता व सेनापति
3. छत्रिका (Chatrika)शाही छत्र धारण करने वालीप्रजापालक रक्षक व सर्वोच्च पदनिर्भय रक्षक व कानूनविद
4. गंडान्ता (Gandanta)द्वितीय चक्र का अंतिम गंडांत द्वारअहंकार का दमन व नव-जन्मगंडांत शांति के बाद महा-राजयोग
5. सौम्या (Saumya)बुध देव का अपना नक्षत्रतीक्ष्ण बुद्धि व वाक्-चातुर्यचतुर कूटनीतिज्ञ व शोधकर्ता
6. सुरेश्वरा (Sureshwara)देवताओं के स्वामी की शक्तिविरोधियों का दमन व अखंड जीतनिष्काम विजेता व गुप्त साधक

✨ 5. ज्येष्ठा नक्षत्र में 4 चरण नवमांश विभाजन तालिका (4 Padas Table)

नक्षत्र चरण (Pada) विस्तार अंश (Degree Range) नवमांश राशि (Navamsha) नवमांश स्वामी फलित गुणधर्म व स्वभाव
प्रथम चरण (Pada 1)16° 40' - 20° 00'धनु नवमांश (Sagittarius)गुरु (Jupiter)प्रतापी धर्मराज, कानूनविद।
द्वितीय चरण (Pada 2)20° 00' - 23° 20'मकर नवमांश (Capricorn)शनि (Saturn)कठोर प्रशासक, खुफिया हेड।
तृतीय चरण (Pada 3)23° 20' - 26° 40'कुंभ नवमांश (Aquarius)शनि (Saturn)परमाणु वैज्ञानिक, शोधकर्ता।
चतुर्थ चरण (Pada 4)26° 40' - 30° 00'मीन नवमांश (Pisces)गुरु (Jupiter)गंडांत पद! तांत्रिक, मोक्ष योगी।

♉ 6. ज्येष्ठा नक्षत्र में 9 नवग्रहों का विस्तृत फलित तालिका चार्ट (9 Planets in Jyeshtha Table)

ग्रह स्थिति (Planet in Jyeshtha) ज्योतिषीय स्थिति व सम्बद्धता फलित प्रभाव व व्यक्तित्व (Personality Traits) करियर व राजयोग (Career & Success) सावधानियां व सात्विक परिहार
1. सूर्य (Sun) in ज्येष्ठा मित्र राशि / प्रतापी सम्राट राजा जैसा स्वाभिमान, वरिष्ठ। राष्ट्रपति, रक्षा मंत्री, CEO। अहम् से बचें; सूर्य अर्घ्य।
2. चंद्रमा (Moon) in ज्येष्ठा गंडांत प्रभाव / नीच क्षेत्र तीक्ष्ण मन, स्वाभिमानी, धनी। खुफिया प्रमुख, तांत्रिक हीलर। अति-अहंकार से बचें; शिव पूजन।
3. मंगल (Mars) in ज्येष्ठा स्वराशि (Own Sign - वृश्चिक) महा-पराक्रम राजयोग! वज्र योद्धा। सर्वोच्च सेनापति, सर्जन, बिल्डर। क्रोध पर नियंत्रण रखें; हनुमान पूजा।
4. बुध (Mercury) in ज्येष्ठा स्वराशि (Own Nakshatra) महा-बुद्धि राजयोग! चतुर। विदेश नीति सम्राट, कूटनीतिज्ञ, CA। छल-कपट से बचें; दुर्गा पूजा।
5. गुरु (Jupiter) in ज्येष्ठा मित्र राशि / सात्विक वरिष्ठ महा-विद्वान, चीफ जस्टिस। चीफ जस्टिस, कुलपति, धर्मगुरु। ज्ञान के अहम् से बचें; पुखराज।
6. शुक्र (Venus) in ज्येष्ठा मित्र राशि / शाही सौंदर्य गुप्त ऐश्वर्य, लक्जरी जीवन। कला व्यापारी, लक्जरी ब्रांड्स हेड। अति-विलासिता से बचें; श्रीसूक्त पाठ।
7. शनि (Saturn) in ज्येष्ठा मित्र राशि / धीर प्रशासक कठोर अनुशासित, तपा हुआ कर्मठ। माइनिंग प्रमुख, न्यायाधीश, उद्योगपति। अकेलापन से बचें; तेल दान।
8. राहु (Rahu) in ज्येष्ठा मित्र राशि / गुप्त कूटनीति अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, शोध। खुफिया एजेंसी प्रमुख, AI रिसर्च। छल-कपट से बचें; सप्तधान्य दान।
9. केतु (Ketu) in ज्येष्ठा मित्र राशि / गंडांत मोक्ष अगाध आत्मिक तपोबल, वैराग्य। तंत्र साधक, योग आचार्य, संत। अति-विरक्ति से बचें; गणेश पूजन।
8 9 10 11 12 1 2 3 4 5 6 7 बुध
📊 चित्र 1: ज्येष्ठा नक्षत्र भचक्र स्थिति एवं इंद्र गंडांत कुण्डली (वृश्चिक राशि 16° 40' से 30° 00' | बुध स्वामित्‍व | देवराज इंद्र देवता | चतुर्थ चरण वृश्चिक-धनु गंडांत संधि)

🛡️ ज्येष्ठा नक्षत्र: देवराज इंद्र, शाही छत्र एवं द्वितीय चक्र समापन

  • द्वितीय नवक का समापन (18th Nakshatra): ज्येष्ठा नक्षत्र भचक्र के द्वितीय चक्र (मघा से ज्येष्ठा) का अंतिम नक्षत्र है। यहाँ वृश्चिक राशि (जल तत्व) और धनु राशि (अग्नि तत्व) का संधि बिंदु नक्षत्र गंडांत निर्मित करता है।
  • देवराज इंद्र व ज्येष्ठता: इसके अधिष्ठात्री देवताओं के राजा 'देवराज इंद्र' हैं। यह जातक को प्रशासनिक प्रतिष्ठा, परिवार या संस्था में सर्वोच्च वरिष्ठ ('ज्येष्ठ') पद, और विपत्ति में सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
  • अचूक सात्विक परिहार: गंडांत शांति हेतु नवजात शिशु के जन्म पर गंडांत शांति अनुष्ठान, भगवान विष्णु व इंद्र देव की आराधना, तथा पन्ना या हरी मूंग का दान करना अत्यंत कल्याणकारी है।

📝 7. मुख्य बिंदु सार-संक्षेप (Chapter Summary)

  • 1. भचक्र का अष्टादश नक्षत्र: ज्येष्ठा नक्षत्र वृश्चिक राशि के 16° 40' से 30° 00' तक फैला भचक्र का अष्टादश नक्षत्र व ज्येष्ठता का धाम है।
  • 2. देवराज इंद्र कथा व ज्येष्ठता: इसके देवता देवराज इंद्र हैं, जो जातक को समाज व परिवार में सर्वोच्च वरिष्ठ ('ज्येष्ठ') पद प्रदान करते हैं।
  • 3. शाही छत्र प्रतीक व गंडांत: शाही छत्र प्रतीक सर्वोच्च रक्षा का द्योतक है तथा चतुर्थ चरण 'ज्येष्ठा-मूल गंडांत' महा-पावन संधि है।
  • 4. 4 चरण नवमांश विभाजन: इसके 4 चरण धनु, मकर, कुंभ व मीन (गंडांत मोक्ष पद) नवमांश में विभाजित हैं जो उच्च कूटनीतिक पद देते हैं।
  • 5. सात्विक परिहार: अहम् से बचने हेतु शिव पूजन, 'विष्णु सहस्रनाम' पाठ, गंडांत शांति पूजा व कनिष्ठिका में पन्ना धारण करना परम शुभ रहता है।

❓ 8. बहुप्रचलित प्रश्नोत्तरी (SEO FAQs)

प्रश्न 1: देवराज इंद्र की पौराणिक कथा और 'ज्येष्ठता' का ज्येष्ठा नक्षत्र से क्या संबंध है?
उत्तर: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार ज्येष्ठा दक्ष प्रजापति की सबसे बड़ी पुत्री थी और इसके देवता स्वर्ग के अधिपति देवराज इंद्र हैं। इसी कारण इस नक्षत्र में जन्मे जातक में जन्मजात नेतृत्व गुण होता है और वे समाज, संस्था या परिवार में हमेशा सर्वोच्च वरिष्ठ ('ज्येष्ठ') पद पर ही विराजमान होते हैं।
प्रश्न 2: वृश्चिक-धनु 'ज्येष्ठा-मूल गंडांत' (Gandanta) का जातक के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: ज्येष्ठा नक्षत्र का चतुर्थ चरण (26° 40' से 30° 00' वृश्चिक) जल राशि से अग्नि राशि के मिलन का 'गंडांत' है। इस चरण में जन्मे जातक के जीवन में शुरुआती वर्ष संघर्षमय रहते हैं। विधि-विधान से 'गंडांत शांति पूजा' कराने के पश्चात् जातक का अहंकार मिट जाता है और वह जीवन में अप्रत्याशित राजयोग व आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त करता है।
प्रश्न 3: ज्येष्ठा नक्षत्र के जातकों के लिए सबसे अचूक सात्विक उपाय क्या हैं?
उत्तर: ज्येष्ठा नक्षत्र के स्वामी बुध देव और देवता देवराज इंद्र हैं। इनके दोष शमन व अखंड प्रतिष्ठा हेतु बुधवार को 'विष्णु सहस्रनाम' का पाठ करना, शिवलिंग पर जल चढ़ाकर 108 बार 'ॐ नमः शिवाय' जाप करना, पक्षियों को हरा मूंग दाना डालना, और कनिष्ठिका उंगली में सोने या चांदी में 5 से 7 रत्ती का शुद्ध जाम्बियन पन्ना (Emerald) धारण करना परम लाभदायक है।
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