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वैदिक ज्योतिष / 27 नक्षत्र महाविज्ञान
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वैदिक ज्योतिष मॉड्यूल: 27 नक्षत्र महाविज्ञान

अध्याय 4.12: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र (Uttara Phalguni Nakshatra) विस्तृत परिचय, पौराणिक कथाएं, 4 चरण नवमांश, 9 नवग्रह प्रभाव व सात्विक उपाय

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का अति-विस्तृत परिचय, अर्यमा देव व शिव-पार्वती विवाह की पौराणिक कथा, सूर्य स्वामित्‍व, 4 चरण नवमांश व 9 नवग्रह फल।

भचक्र का द्वादश नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी (Uttara Phalguni - धर्म, मित्रता एवं विवाह नक्षत्र) का विस्तृत खगोलीय व पौराणिक स्वरूप, 12 आदित्यों में से अर्यमा देव की पावन महागाथा, भगवान शिव और माता पार्वती के भव्य विवाह का रहस्य, विवाह मंडप (Bed's Back Legs / Wedding Canopy) प्रतीक की पावन ऊर्जा, सूर्य का स्वामित्‍व, सिंह-कन्या (26° 40' सिंह से 10° 00' कन्या) विस्तार, 4 पद नवमांश विभाजन, 9 नवग्रहों का उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में विस्तृत फलित एवं सात्विक उपाय
📜 मेंटर Vikraant का आत्मीय मार्गदर्शन (Guru's Keynote)

प्रिय शिष्य! वैदिक ज्योतिष में 360 अंश के संपूर्ण आकाशमंडल का द्वादश नक्षत्र 'उत्तराफाल्गुनी' (Uttara Phalguni) है। सिंह राशि में 26° 40' से लेकर कन्या राशि में 10° 00' तक फैला यह नक्षत्र सत्य, निष्ठा, धर्म की रक्षा, मैत्री अनुबंधों (Contracts), भगवान शिव व माता पार्वती का पावन विवाह, और समाज के निर्माण का साक्षात प्रतीक है। महर्षि पराशर के अनुसार, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के स्वामी आत्मा, तेज और प्राधिकार के कारक 'सूर्य देव' हैं और इसके अधिष्ठात्री देवता 12 आदित्यों में से धर्म, न्याय और संधियों के स्वामी साक्षात 'अर्यमा देव' (Aryaman) हैं। यह नक्षत्र जातक को समाज में अत्यधिक पूजनीय, सत्यवादी, उदार दानवीर और न्यायप्रिय शासक बनाता है।

"अर्यमा अधिपा यस्य रविः (सूर्यः) स्वामी महाबलः।
सिंह-कन्या संस्थितो ध्रुवः सर्वसत्य प्रदायकः॥
विवाह मण्डपरूपो मनुष्यगणो आदिनाड़ी धर्मसाधकः।
सत्यवादी महादानी सर्वसिद्धि प्रदायकः॥"


(भावार्थ: अर्यमा देव जिनके अधिष्ठात्री देवता हैं, महाबली सूर्य देव जिनके स्वामी हैं, जो सिंह व कन्या राशि के संधि पर स्थित, ध्रुव स्वभाव वाले और सर्व-सत्य को प्रदान करने वाले हैं, वे उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र हैं। विवाह मंडप प्रतीक, मनुष्य गण, आदि नाड़ी से युक्त यह नक्षत्र सत्यवादी व महादानी बनाकर सर्वसिद्धि देता है।)

💡 1. परिचय (Introduction & Utility of Uttara Phalguni Nakshatra)

  • भचक्र का द्वादश द्वार एवं सूर्य का महा-स्वामित्‍व: उत्तराफाल्गुनी (Uttara Phalguni) संपूर्ण भचक्र का द्वादश नक्षत्र (26° 40' सिंह से 10° 00' कन्या राशि) है, जिसके स्वामी आत्मा, तेज, प्राधिकार और सत्य के कारक 'सूर्य देव' हैं। यह नक्षत्र धर्मनिष्ठता और सामाजिक नेतृत्व का मूलाधार है।
  • अर्यमा देव अधिष्ठाता एवं ध्रुव/स्थिर स्वभाव: इस नक्षत्र के देवता 12 आदित्यों में से एक 'अर्यमा देव' (Aryaman) हैं। इसका स्वभाव 'ध्रुव व स्थिर' (Fixed & Permanent) है; इसमें दीर्घकालिक संधियों (Contracts), संस्थागत संरचनाओं, और स्थायी विवाह संबंधों को स्थापित करने की शक्ति होती है।
  • विवाह मंडप व पलंग के पिछले पाए (Couch/Canopy) प्रतीक का रहस्य: उत्तराफाल्गुनी का प्रतीक चिह्न 'विवाह मंडप' (Wedding Canopy) अथवा 'चारपाई के पीछे के दो पाए' (Back legs of a Bed) है। यह प्रतीक विवाह के पवित्र वचनों, समाज निर्माण, अटूट मित्रता और न्यायपूर्ण व्यवस्था का द्योतक है।
  • 4 चरण नवमांश विभाजन (4 Padas Analysis): उत्तराफाल्गुनी के प्रथम चरण सिंह राशि में (धनु नवमांश) और अंतिम 3 चरण कन्या राशि में (मकर, पुष्कर कुंभ व मीन नवमांश) पढ़ते हैं, जो जातक को धार्मिक न्याय, कठोर अनुशासन, मानवी कल्याण व निष्काम सेवाभाव देते हैं।
  • शारीरिक अंग व कालपुरुष पाचन तंत्र: कालपुरुष के शरीर में उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र रीढ़ की हड्डी (Spine), होंठ, गले का निचला भाग, यकृत (Liver) और पाचन ग्रंथियों का स्वामी है।
  • मनुष्य गण, आदि नाड़ी व गौ (गाय) योनि का प्रभाव: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र मनुष्य गण, आदि नाड़ी और गौ (गाय) योनि से सम्बद्ध है; यह महान राजनेताओं, न्यायाधीशों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विवाह सलाहकारों, राजदूतों, परोपकारी दानी सज्जनों और अध्यापकों का नेतृत्व करता है।
  • सात्विक परिहार एवं ऊर्जा संतुलन: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के जातकों को अत्यधिक कठोरता, दूसरों पर अति-आदर्श थोपने, और हठी स्वभाव से बचने हेतु सूर्य देव की आराधना, 'आदित्य हृदय स्तोत्र' पाठ, तथा तांबे के पात्र से जल अर्घ्य व माणिक्य (Ruby) धारण करना अत्यंत फलदायी होता है।

📖 2. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का पौराणिक, खगोलीय एवं आध्यात्मिक स्वरूप (Puranic & Astronomical Attributes)

2.1 12 आदित्यों में से 'अर्यमा देव' की पौराणिक महागाथा एवं संधियों का विधान

ऋग्वेद और वायु पुराण के अनुसार, महर्षि कश्यप और अदिति के 12 पुत्रों में से 'अर्यमा देव' धर्म, न्याय, मैत्री और सामाजिक व्यवस्था के अधिपति हैं। 'अर्यमा' का शाब्दिक अर्थ 'मित्र, रक्षक और धर्म का संवाहक' (The Companion / Protector) है। वैदिक काल से ही समाज में होने वाले विवाह, व्यापारिक समझौते और अंतर्राष्ट्रीय संधियां साक्षात अर्यमा देव को साक्षी मानकर ही की जाती हैं।

विवाह के समय जब वर और वधू सप्तपदी (सात फेरे) लेते हैं, तो वे अर्यमा देव से ही प्रार्थना करते हैं कि उनका प्रेम और गृहस्थ जीवन जीवन भर अटूट रहे। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में जन्मे जातक वचन के पक्के, अपने मित्रों हेतु प्राण देने वाले और समाज में शांति स्थापित करने वाले महान मध्यस्थ होते हैं।

2.2 भगवान शिव और जगज्जननी माता पार्वती का दिव्य विवाह महागाथा

स्कंद पुराण और शिव पुराण की कथा के अनुसार, जब हिमाचल पुत्री माता पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह करना स्वीकार किया, तो ऋषियों ने विवाह हेतु 'उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र' की पावन तिथि निश्चित की। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में ही भगवान शिव और माता पार्वती का अलौकिक विवाह संपन्न हुआ था। इसी कारण यह नक्षत्र सुयोग्य वर/वधू की प्राप्ति, गृहस्थ आश्रम के सुख और सुखी दाम्पत्य जीवन का साक्षात वरदान है।

2.3 सूर्य (स्वामी व सिंह राशि) एवं बुध (कन्या राशि / उच्च बुध) का प्रतापी गठबंधन

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि (स्वामी सूर्य - राजा) में है और अंतिम तीन चरण कन्या राशि (स्वामी बुध - जहाँ बुध परम उच्च होता है) में हैं। सूर्य का स्वामित्‍व, अर्यमा का धर्म और बुध का परम उच्चत्व मिलकर जातक को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का कूटनीतिज्ञ, मुख्य न्यायाधीश, सफल बैंकर, और समाज का निर्माण करने वाला 'युगपुरुष' बनाता है।

2.4 अर्यमा लोक एवं पितृ तर्पण की गाथा

वायु पुराण के अनुसार, अर्यमा देव को पितरों के प्रमुख स्वामियों में भी गिना जाता है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में किया गया दान, गोसेवा, और अनाथों की सहायता करने से पितर देव अत्यंत प्रसन्न होते हैं। इस नक्षत्र का जातक जन्मजात दानवीर (Generous Donor) होता है, जो दूसरों के दुखों को देखकर अपना सब कुछ सहर्ष दान कर देता है।

2.5 प्रथम चरण (26° 40' - 30° 00' सिंह): धनु नवमांश, गुरु का ज्ञान व प्रतापी धर्मराज

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि (26° 40' से 30° 00') धनु नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। धनु एक द्विस्वभाव अग्नि तत्व राशि है। यह चरण जातक को प्रतापी स्वाभिमान, अगाध धार्मिक ज्ञान, चीफ जस्टिस जैसा न्यायप्रिय स्वभाव और उच्च प्रशासनिक पद प्रदान करता है।

2.6 द्वितीय चरण (00° 00' - 03° 20' कन्या): मकर नवमांश, शनि का अनुशासन व कठोर कर्मनिष्ठा

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का द्वितीय चरण कन्या राशि (00° 00' से 03° 20') मकर नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी कर्मफलदाता शनि देव हैं। मकर एक चर पृथ्वी तत्व राशि है। यह चरण जातक को व्यावहारिक बुद्धि, कठोर अनुशासन, माइनिंग व प्रशासनिक क्षेत्र में सफलता और समाज सेवा की प्रेरणा देता है।

2.7 तृतीय चरण (03° 20' - 06° 40' कन्या): कुंभ नवमांश, पुष्कर नवमांश एवं उच्च बुध का चमत्कार

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का तृतीय चरण कन्या राशि (03° 20' से 06° 40') कुंभ नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी शनि देव हैं। यह पावन 'पुष्कर नवमांश' है और यहाँ बुध परम उच्च प्रभाव देता है! यह चरण जातक को अद्वितीय वैज्ञानिक बुद्धि, डेटा विश्लेषण, अंतर्राष्ट्रीय संधियों का विशेषज्ञ और विशाल परोपकारी संस्थान चलाने का राजयोग देता है।

2.8 चतुर्थ चरण (06° 40' - 10° 00' कन्या): मीन नवमांश, गुरु की निष्काम करुणा एवं सात्विक हीलिंग

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का चतुर्थ चरण कन्या राशि (06° 40' से 10° 00') मीन नवमांश में पड़ता है, जिसके स्वामी देवगुरु बृहस्पति हैं। मीन एक द्विस्वभाव जल तत्व राशि है। यह चरण कठोरता को समाप्त कर जातक को अत्यंत दयालु हीलर, आध्यात्मिक आचार्य, निष्काम समाज सेवक और मोक्ष का अधिकारी बनाता है।

📊 3. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के मूल खगोलीय एवं पौराणिक मापदंडों की महा-मास्टर तालिका

गुण व मापदंड (Attribute) ज्योतिषीय मान व पौराणिक विवरण (Astrological & Puranic Details)
भचक्र क्रम व विस्तार (Zodiac Range)द्वादश नक्षत्र (26° 40' सिंह से 10° 00' कन्या राशि तक)
स्वामी ग्रह (Ruling Planet)सूर्य देव (Sun / आत्मा / सत्ता व धर्म कारक)
अधिष्ठात्री देवता (Deity)अर्यमा देव (Aryaman / 12 आदित्यों में से एक / धर्म व मैत्रीपति)
प्रतीक चिह्न (Symbol)विवाह मंडप / पलंग के पीछे के पाए (Wedding Canopy / Bed Legs)
गण व नाड़ी (Gana & Nadi)मनुष्य गण (Manushya Gana) / आदि नाड़ी (Adi Nadi)
योनि व तत्व (Yoni & Tattva)गौ योनि (Cow / गाय) / अग्नि-पृथ्वी तत्व
नक्षत्र स्वभाव (Quality)ध्रुव व स्थिर (Fixed & Permanent)
सम्बद्ध राशि (Primary Sign)सिंह (1 चरण) व कन्या राशि (3 चरण)
दिशा व स्थिति (Direction)पूर्व दिशा (East) / उर्ध्वमुख नक्षत्र
शरीर के अंग (Body Signification)रीढ़ की हड्डी, होंठ, यकृत व पाचन ग्रंथियां

🔥 4. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के विविध नाम एवं symbolic गुणधर्म तालिका

सं. व नाम मूल संस्कृत अर्थ आध्यात्मिक व खगोलीय गुणधर्म ज्योतिषीय प्रभाव व फलित
1. उत्तराफाल्गुनी (Uttara Phalguni)द्वितीय लाल फाल्गुन नक्षत्रधर्म, विवाह व संधियों का धामस्थायी विवाह सुख व समाज निर्माण
2. अर्यम्णा (Aryamna)अर्यमा देव का अपना पावन क्षेत्रअटूट मित्रता व न्यायप्रियतामहान मध्यस्थ, कूटनीतिज्ञ व रक्षक
3. वैवाहिकी (Vaivahiki)शिव-पार्वती विवाह का नक्षत्रगृहस्थ आश्रम का पावन वरदानसुयोग्य जीवनसाथी व सुखी दाम्पत्य
4. दानशीला (Danashila)महा-दानी स्वभाव वालीदूसरों के दुखों को हरनादानी सज्जन, NGO प्रमुख व हीलर
5. ध्रुवा (Dhruva)अचल व स्थिर सिद्धांतों वालीदीर्घकालिक संधियां व व्यापारबड़े व्यापारिक समझौते व अनुबंध
6. सूर्यांशा (Suryamsha)सूर्य देव का अपना नक्षत्रप्रतापी तेज व आत्म-बलउच्च राजकीय पद, IAS व नेता

✨ 5. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में 4 चरण नवमांश विभाजन तालिका (4 Padas Table)

नक्षत्र चरण (Pada) विस्तार अंश (Degree Range) नवमांश राशि (Navamsha) नवमांश स्वामी फलित गुणधर्म व स्वभाव
प्रथम चरण (Pada 1)26° 40' सिंह - 30° 00' सिंहधनु नवमांश (Sagittarius)गुरु (Jupiter)प्रतापी धर्मराज, चीफ जस्टिस।
द्वितीय चरण (Pada 2)00° 00' कन्या - 03° 20' कन्यामकर नवमांश (Capricorn)शनि (Saturn)व्यावहारिक अनुशासित, प्रशासक।
तृतीय चरण (Pada 3)03° 20' कन्या - 06° 40' कन्याकुंभ नवमांश (Aquarius)शनि (Saturn)पुष्कर नवमांश! बुध उच्च! वैज्ञानिक।
चतुर्थ चरण (Pada 4)06° 40' कन्या - 10° 00' कन्यामीन नवमांश (Pisces)गुरु (Jupiter)दयालु हीलर, सात्विक गुरु, दानी।

♉ 6. उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में 9 नवग्रहों का विस्तृत फलित तालिका चार्ट (9 Planets in Uttara Phalguni Table)

ग्रह स्थिति (Planet in Uttara Phalguni) ज्योतिषीय स्थिति व सम्बद्धता फलित प्रभाव व व्यक्तित्व (Personality Traits) करियर व राजयोग (Career & Success) सावधानियां व सात्विक परिहार
1. सूर्य (Sun) in उत्तराफाल्गुनी स्वराशि (Own Nakshatra) महा-तेजस्वी राजयोग! धर्मनिष्ठ। राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, IAS प्रमुख। अहम् से बचें; सूर्य अर्घ्य।
2. चंद्रमा (Moon) in उत्तराफाल्गुनी जन्म नक्षत्र / मित्र राशि अत्यंत सात्विक मन, दानवीर, सुखी। न्यायाधीश, विवाह सलाहकार, हीलर। अति-कठोरता से बचें; शिव पूजन।
3. मंगल (Mars) in उत्तराफाल्गुनी मित्र राशि / धर्म योद्धा निडर न्यायकर्ता, सेनापति, बिल्डर। सेनापति, सर्जन, उच्च प्रशासनिक पद। क्रोध पर नियंत्रण रखें; हनुमान पूजा।
4. बुध (Mercury) in उत्तराफाल्गुनी कन्या में परम उच्च (Exalted)! महा-बुद्धि राजयोग! कूटनीतिज्ञ। सर्वोच्च बैंकर, राजदूत, डेटा वैज्ञानिक। अति-आदर्शवाद से बचें; दुर्गा पूजा।
5. गुरु (Jupiter) in उत्तराफाल्गुनी मित्र राशि / सात्विक गुरु महा-विद्वान, धर्मरक्षक, न्यायप्रिय। चीफ जस्टिस, कुलपति, धर्मगुरु। ज्ञान के अहम् से बचें; पुखराज।
6. शुक्र (Venus) in उत्तराफाल्गुनी नीच राशि (कन्या भाग) विवाह हेतु संघर्ष, कलात्मक सेवा। विवाह ब्यूरो, फैशन मैनेजर, हीलर। अति-आसक्ति से बचें; श्रीसूक्त पाठ।
7. शनि (Saturn) in उत्तराफाल्गुनी मित्र राशि / धीर धर्मनिष्ठ कठोर अनुशासित, तपा हुआ कर्मठ। माइनिंग प्रमुख, कानूनविद, उद्योगपति। आलस्य से बचें; शनिवार तेल दान।
8. राहु (Rahu) in उत्तराफाल्गुनी मित्र राशि / अंतर्राष्ट्रीय संधियां विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति। विदेश नीति प्रमुख, शोधकर्ता, NGO। छल-कपट से बचें; सप्तधान्य दान।
9. केतु (Ketu) in उत्तराफाल्गुनी मित्र राशि / मोक्ष योग अगाध आत्मिक खोज, निष्काम दानी। तंत्र साधक, योग हीलर, सात्विक संत। अति-विरक्ति से बचें; गणेश पूजन।
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📊 चित्र 1: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र भचक्र स्थिति एवं द्वि-राशि विस्तार कुण्डली (प्रथम चरण सिंह 26° 40'-30° 00' | द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ चरण कन्या 00° 00'-10° 00' | अर्यमा देव अधिष्ठाता)

💒 उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र: अर्यमा देव, विवाह मंडप एवं धर्म संधियां

  • सिंह व कन्या का मिलन: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र का प्रथम चरण सिंह राशि (सूर्य) में राजसी प्रतिष्ठा देता है, जबकि शेष 3 चरण कन्या राशि (बुध) में व्यावहारिक बुद्धि, वित्तीय विश्लेषण और कूटनीतिक सफलता प्रदान करते हैं।
  • अर्यमा देव व शिव-पार्वती विवाह: इसके अधिष्ठात्री 12 आदित्यों में से 'अर्यमा देव' हैं, जो संधियों, मित्रता, अनुबंधों और विवाह के संरक्षक हैं। इसी नक्षत्र में भगवान शिव और माता पार्वती का पावन विवाह संपन्न हुआ था।
  • विवाह मंडप (Mandap) प्रतीक: इसका प्रतीक शय्या के पिछले पाए या विवाह मंडप है, जो जीवनसाथी के प्रति अगाध निष्ठा, सामाजिक मर्यादा और स्थायी संबंधों का निर्माण करता है।

📝 7. मुख्य बिंदु सार-संक्षेप (Chapter Summary)

  • 1. भचक्र का द्वादश नक्षत्र: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र 26° 40' सिंह से 10° 00' कन्या तक फैला भचक्र का द्वादश नक्षत्र व धर्म का धाम है।
  • 2. अर्यमा देव व शिव-पार्वती विवाह कथा: इसके देवता 12 आदित्यों में से 'अर्यमा देव' (धर्म व संधियों के अधिपति) हैं और इसमें शिव-पार्वती का विवाह हुआ था।
  • 3. विवाह मंडप प्रतीक का पावन रहस्य: विवाह मंडप प्रतीक स्थायी संबंधों, वचन की पक्कता, और समाज के निर्माण का साक्षात प्रतीक है।
  • 4. 4 चरण नवमांश विभाजन: इसके 4 चरण धनु, मकर, कुंभ (पुष्कर नवमांश जहाँ बुध उच्च है) व मीन नवमांश में विभाजित हैं जो उच्च कूटनीतिक पद देते हैं।
  • 5. सात्विक परिहार: अति-कठोरता से बचने हेतु सूर्य देव को जल अर्घ्य, 'आदित्य हृदय स्तोत्र' पाठ, गोसेवा व तांबे में शुद्ध माणिक्य (Ruby) धारण करना शुभ रहता है।

❓ 8. बहुप्रचलित प्रश्नोत्तरी (SEO FAQs)

प्रश्न 1: 12 आदित्यों में से 'अर्यमा देव' की पौराणिक कथा का उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर: पौराणिक ग्रंथों के अनुसार 'अर्यमा देव' धर्म, न्याय, मित्रता और सामाजिक संधियों के स्वामी हैं। विवाह में ली जाने वाली सप्तपदी (सात फेरे) अर्यमा देव को साक्षी मानकर ही संपन्न होती है। इसी कारण उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में जन्मे जातक अपने वचन के पक्के, सच्चे मित्र, समाज के रक्षक और न्यायप्रिय प्रशासक होते हैं।
प्रश्न 2: भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र से क्या पौराणिक संबंध है?
उत्तर: स्कंद पुराण के अनुसार भगवान शिव और जगज्जननी माता पार्वती का पावन विवाह उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र की शुभ तिथि में संपन्न हुआ था। इसी कारण इस नक्षत्र को विवाह, नए रिश्तों की शुरुआत, और सुखी गृहस्थ आश्रम का साक्षात वरदान माना जाता है। इस नक्षत्र के जातकों का वैवाहिक जीवन अत्यंत निष्ठावान और स्थायी होता है।
प्रश्न 3: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के जातकों के लिए सबसे अचूक सात्विक उपाय क्या हैं?
उत्तर: उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के स्वामी सूर्य देव और देवता अर्यमा देव हैं। इनके दोष शमन व अखंड प्रतिष्ठा हेतु प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्य देव को तांबे के लोटे से रोली व अक्षत मिलाकर जल अर्घ्य देना, 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ करना, गोमाता की सेवा करना, और अनामिका उंगली में तांबे या सोने में 5 से 7 रत्ती का शुद्ध बर्मा माणिक्य (Ruby) धारण करना परम लाभदायक है।
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