प्रिय शिष्य! पराशरी ज्योतिष में नक्षत्र आधारित विंशोत्तरी दशा का प्रयोग होता है, किंतु जैमिनी ज्योतिष की आत्मा है — चर दशा (Chara Dasha)। चर दशा में ग्रहों की जगह राशियों की दशाएँ आती हैं।
चर दशा की गणना हेतु सबसे पहले लग्न की राशि देखी जाती है कि वह प्रत्यक्ष (Direct Sequence: 1, 2, 3...) या अप्रत्यक्ष (Indirect Sequence: 12, 11, 10...) क्रम में चलेगी। तत्पश्चात राशि स्वामी की स्थिति के अनुसार प्रत्येक राशि की दशा अवधि (1 से 12 वर्ष) निकाली जाती है। आइए, इस गणित को सरलता से समझें!
📐 1. चर दशा क्रम नियम (Sequence of Chara Dasha)
दशा किस दिशा में चलेगी, यह लग्न राशि से तय होता है:
| लग्न राशि (Ascendant Sign) | दशा संचरण का क्रम (Dasha Sequence) |
|---|---|
| मेष, तुला, वृश्चिक, धनु | प्रत्यक्ष क्रम (Direct Order) — 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10, 11, 12। |
| वृषभ, मिथुन, कन्या, मकर | अप्रत्यक्ष क्रम (Indirect Order) — 12, 11, 10, 9, 8, 7, 6, 5, 4, 3, 2, 1। |
| कर्क, सिंह, कुंभ, मीन | समीपस्थ क्रम (Adjacent Order) — विशेष पद क्रम। |
⏳ 2. राशि दशा अवधि गणना सूत्र (Calculating Years for Each Sign)
1. राशि स्वामी (Sign Lord) अपनी राशि से जितने घर दूर स्थित है, उसमें से 1 घटाएं। वही उस राशि की दशा अवधि (वर्षों में) होगी।
2. यदि राशि स्वामी अपनी ही राशि में बैठा हो, तो उसे 12 वर्ष की अवधि दी जाती है।
3. वर्ष वृद्धि (Exaltation Additions): यदि राशि स्वामी उच्च का हो, तो 1 वर्ष बढ़ा दिया जाता है।
4. वर्ष ह्रास (Debilitation Deductions): यदि राशि स्वामी नीच का हो, तो 1 वर्ष घटा दिया जाता है।